गुरुवार, मार्च 03, 2011

साझी संस्कृति के आयाम और बदलते सरोकार

भारतीय संस्कृति का प्रमुख तत्व सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भावना रही है। सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव मात्र शब्द नहीं हैं, अपितु मानवीय भावना हैं। सद् माने सत्य या अच्छा और भाव माने विचार अर्थात सभी लोगों के प्रति अच्छा विचार रखना ही सद्भावना का प्रतीक है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक राष्ट्र एवम् पृथक-पृथक जातियों, सम्प्रदायों, भाषाओं व धर्मों की खूबसूरत सतरंगी माला में पिरोया हुआ राष्ट्र है। इसकी संस्कृति एक है एवं सुजला, सुफला, शस्य श्यामला राष्ट्र के प्रति सबका समर्पण भी एक है। हमें सदैव से इस बात पर गर्व रहा है कि भारत के एक अरब से ज्यादा लोग जिनमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं अन्य जातियाँ व जनजातियाँ शामिल हैं, उनकी जड़ों में सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव पहले से ही मजबूत पकड़ बनाये हुये है। यही कारण है कि सैकड़ों आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णता बरकरार है। जाति-धर्म के अनेक झंझावतों के बावजूद हर भारतीय एक भारतीयता के रिश्ते में बंधा हुआ है। भाषा, बोली, त्यौहार, खान-पान या वेषभूषा में फर्क होने के बावजूद भी एक-दूसरे के साथ विभिन्न पर्वों में हम शरीक हुए हैं और यही हमारी साझी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

ऐसा नहीं है कि संस्कृति के पहरूये सिर्फ पुरूष वर्ग में ही हुए हैं, बल्कि महिलाओं ने भी लीक से हटकर इस क्षेत्र में ख्याति अर्जित की है। तमाम मुस्लिम महिलाओं ने जहाँ आजादी के आन्दोलन में राष्ट्रीय एकता से वशीभूत होकर सक्रिय भूमिका निभाई, वहीं आजादी के बाद भी हर क्षेत्र में उन्होंने प्रमुखता से नाम रोशन किया। इनमें से तमाम ऐसी महिलायें हैं, जो परम्परागत रूढ़ियों से परे हटकर समाज को नई राह दिखा रहीं हैं एवं सामाजिक सद्भाव की नई मिसाल कायम कर रही हैं। राज्यसभा की उपसभापति रही नजमा हेपतुल्ला, अभिनेत्री शबाना आजमी, लेखिका इस्मत चुगतई, कुर्रतुल ऐन हैदर- ये सभी नाम साझी संस्कृति की संवाहक परम्परा को दर्शाते हैं। साम्प्रदायिकता का उपचार ये सदैव साझी संस्कृति में ढूँढती रहीं। इन्होंने साझी संस्कृति के अंदाज को यूँ जिया- ‘‘बच्चा मुसलमान के घर होता है, गीत कृष्ण-कन्हैया के गाये जाते हैं, मुसलमान बच्चे बरसात की दुआ माँगने के लिए मुँह नीला-पीला किये गली-गली टीन बजाते हैं, साथ-साथ चिल्लाते हैं-‘‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की।’’ कुर्रतुल ऐन हैदर ने तो बखूबी लिखा है कि मुसलमान पर्दानशीं औरतें जिन्होंने पूरी उम्र किसी गैर मर्द से बात नहीं की, जब ढोलक लेकर बैठती हैं तो लहक-लहक कर अलापती हैं- ‘‘भरी गगरी मेरी ढलकाई तूने, श्याम हाँ तूने।’’

बनारस पूरे विश्व में अपनी धार्मिक आस्था के साथ-साथ साझी संस्कृति के लिए भी मशहूर है। यह बनारस की माटी का ही प्रभाव है कि प्रख़्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान ने बनारस में गंगा तट पर अवस्थित मंगला गौरी मंदिर से शहनाई वादन की शुरूआत की और वे मुहर्रम के गमीं अवसर पर भी उतनी ही शिद्दत से शहनाई बजाते थे। इसी बनारस की डॉ. नाहिद आब्दी मुस्लिम धर्मानुयायी होने के बावजूद वेदों की ज्ञाता हैं और संस्कृत की सेवा में लगी हुई हैं। संस्कृत में मास्टर डिग्री लेने के बाद उन्होंने वेद जैसे कठिन विषय पर पी0एच0डी0 की है। प्रख्यात शायर मिर्जा गालिब की प्रसिद्ध ‘मसनवी चिरागे दैर’ का वे ‘देवालयस्य दीपः’ नाम से संस्कृत में अनुवाद कर चुकी हैं। रहीम की रचनाओं को वे संस्कृत में बिल्कुल अलग अन्दाज में पेश कर चुकी हैं। बनारस के ही महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ की छात्रा नाजनीन ने हनुमान चालीसा का उर्दू में अनुवाद किया है और रामचरित मानस को भी उर्दू में लिखना आरम्भ कर दिया है। नाजनीन का मानना है कि इतिहास ने उसे साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने हेतु यह कदम उठाने की प्रेरणा दी, जहाँ बादशाह अकबर ने रामायण व महाभारत का अनुवाद अरबी-फारसी में कराया था। इलाहाबाद की बिंते जहरा रिजवी को गीता में दर्शन की पराकाष्ठा महसूस हुई और उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उर्दू अनुवाद किया। गौरतलब है कि पूर्व राष्ट्रपति ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम जिस श्रद्धा से कुरान पढ़ते हैं उसी श्रद्धा से गीता भी पढ़ते हैं। इसी कड़ी में केरल विश्वविद्यालय की संस्कृत वेदांत की परीक्षा में एक मुस्लिम लड़की रहमत ने वर्ष 2009 में सबको पीछे छोड़ते हुए प्रथम स्थान हासिल किया। संस्कृत वेदांत पाठयक्रम शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन पर केन्द्रित है। देवासोम बोर्ड के एक कालेज की इस 21 वर्षीय छात्रा रहमत के मुताबिक संस्कृत राष्ट्रीय संस्कृति की प्रतीक है।

मुस्लिम समुदाय में तमाम महिलाएं अब लीक से हटकर नये आयाम रचने लगी हैं। जहाँ काजी का काम पहले पुरूष के बूते का ही माना जाता रहा है, एक नारी ने पुरूषों का वर्चस्व तोड़ दिया। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की काजी शबनम आरा बेगम भारत की पहली महिला काजी हैं। शबनम के काजी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काजी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काजी बना दिया। वर्ष 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काजी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काजी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काजी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुयीं। अंततः धमकियों और मुकदमों के बीच शबनम अपने को काजी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं। नवाबों का शहर रहा लखनऊ पूरे विश्व में अपनी तहजीब व नफासत के लिए विख्यात है। इसी लखनऊ में अगस्त 2008 में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की अध्यक्ष नाइश हसन और दिल्ली के इमरान का निकाह एक महिला काजी डॉ. सईदा हमीद ने पढ़ाया। गौरतलब है कि डॉ. सईदा हमीद योजना आयोग की सदस्य भी हैं। यही नहीं यहाँ के दारूल उलूम नदवा ने देश की मुस्लिम महिलाओं के लिए मुफ्ती बनने का मार्ग भी प्रशस्त किया है। वस्तुतः मुफ्ती बनने के लिए फ़ाजिल होना जरूरी है और पहले लड़कियां केवल आलमियत तक ही पढ़ाई कर पाती थीं। फजीलत के कोर्स में कुरान के बाद जो सबसे मान्य छः किताबें है जिन्हें हदीस कहा जाता है। बुखारी शरीफ, मुस्लिम शरीफ, अबू दाऊद शरीफ, तिरमिजी शरीफ, निसयान तथा इब्न ए माजा को पढ़कर उस पर शोध करना पड़ता है। इसके बाद एक साल का इफ्ताह का कोर्स होता है जिसे करने के बाद मुफ्ती की डिग्री मिलती है। फजीलत करने के लिए आलमियत होना जरूरी है। तो तैयार हो जाइये कि उत्तर प्रदेश में लड़कियां भी अब मुफ्ती बन सकेंगी और इन्हें भी फतवा देने का हक होगा।

हसरत मोहानी एवं गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ के कानपुर से भला कौन अपरिचित होगा। क्रान्ति की धधकती ज्वाला में बेखौफ कूद पड़ने का अप्रतिम साहस, त्याग और बलिदान इस शहर में बखूबी देखने को मिलते रहे हैं, आगे भी मिलेंगे। नाना साहब और अजीमुल्ला खान ने यहीं पर 1857 की क्रान्ति की रूपरेखा बुनी थी। आजादी के आन्दोलन से लेकर आज तक यहाँ की माटी में नई लकीर खींचने का साहस दिखता है। इसी कानपुर की सगी छः मुस्लिम बहनों ने वन्देमातरम् एवं तमाम राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा क्रान्ति की इस ज्वाला को सदैव प्रज्जवलित किये रहने की कसम उठाई है। गौरतलब है कि इस्लाम धर्म की मान्यता है कि अल्लाह के अलावा वे किसी की इबादत नहीं कर सकते। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, बन्धुत्व एवं सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव से ओत-प्रोत ये लड़कियाँ तमाम कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। इनके नाम नाज मदनी, मुमताज अनवरी, फिरोज अनवरी, अफरोज अनवरी, मैहरोज अनवरी व शैहरोज अनवरी हैं। इनमें से तीन बहनें- नाज मदनी, मुमताज अनवरी व फिरोज अनवरी तो वकालत पेशे से जुड़ी हैं। एडवोकेट पिता गजनफरी अली सैफी की ये बेटियाँं अपने इस कार्य को खुदा की इबादत के रूप में ही देखती हैं। 17 सितम्बर 2006 को कानपुर बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित हिन्दी सप्ताह समारोह में प्रथम बार वंदेमातरम का उद्घोष करने वाली इन बहनों ने 24 दिसम्बर 2006 को मानस संगम के समारोह में पं0 बद्री नारायण तिवारी की प्रेरणा से पहली बार भव्य रूप में वंदेमातरम गायन प्रस्तुत कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। मानस संगम के कार्यक्रम में जहाँ तमाम राजनेता, अधिकारीगण, न्यायाधीश, साहित्यकार, कलाकार उपस्थित होते हैं, वहीं तमाम विदेशी विद्वान भी इस गरिमामयी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। तिरंगे कपड़ों में लिपटी ये बहनें जब ओज के साथ एक स्वर में राष्ट्रभक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं, तो लोग सम्मान में स्वतः अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं। श्रीप्रकाश जायसवाल, डॉ. गिरिजा व्यास, रेणुका चैधरी, राजबब्बर जैसे नेताओं के अलावा इन बहनों ने राहुल गाँधी के समक्ष भी वंदेमातरम् गायन कर प्रशंसा बटोरी। हाल ही में युवा प्रशासक-साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव के जीवन पर जारी पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘‘ के पद्मश्री गिरिराज किशोर द्वारा लोकार्पण अवसर पर इन सगी छः बहनों ने वंदेमातरम्, सरफरोशी की तमन्ना जैसे राष्ट्रभक्ति गीतों का समां बाँध दिया। वन्देमातरम् जैसे गीत का उद्घोष कुछ लोग भले ही इस्लाम धर्म के सिद्वान्तों के विपरीत बतायें पर इन बहनों का कहना है कि हमारा उद्देश्य भारत की एकता, अखण्डता एवं सामाजिक सद्भाव की परम्परा को कायम रखने का संदेश देना है। वे बेबाकी के साथ कहती हैं कि देश को आजादी दिलाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम क्रान्तिकारियों ने एक स्वर में वंदेमातरम् का उद्घोष कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया तो हम भला इन गीतों द्वारा उस सूत्र को जोड़ने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं समरसता की भावना से परिपूर्ण ये बहनें वंदेमातरम् एवं अन्य राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा लोगों को एक सूत्र में जोड़ने की जो कोशिश कर रही हैं, वह प्रशंसनीय व अतुलनीय है।

निश्चिततः सामाजिक व साम्प्रदायिक सद्भाव के इससे अच्छे उदाहरण नहीं हो सकते। पर्दे की ओट से बाहर निकल समाज को नई राह दिखाने वाली इन महिलाओं ने सिद्ध कर दिया है कि जाति-धर्म की सीमाओं से परे हम सिर्फ एक मानव हैं। जब तक यह सोच रहेगी तब तक सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना कायम रहेगी। तभी तो कुर्रतुल ऐन हैदर ने बेबाकी से लिखा कि- ‘‘मिली-जुली संस्कृति किसी अखबार की सुर्खी नहीं, जो दूसरे ही दिन भुला दी जाये। यह तो दुनिया के इतिहास का शीर्षक है जो अपनी जगह महफूज भी है और दूसरी संस्कृतियों को अपनी ओर खींचता है।’’ वर्तमान पीढ़ी में भी तमाम नाम ऐसे हैं, जिन्होंने साझी संस्कृति हेतु न सिर्फ प्रयास किये बल्कि समाज को एक नई राह भी दिखाई। इस साझी सद्भावना को ही मशहूर शायर मोहसिन काकोरवी ने इन शब्दों में सँजोया है -

गर तेरा इज्न हो तो ब्राह्यण करे वजू,
गंगा नहाए शेख, बेकार जुस्तजू।

(आकांक्षा यादव जी का यह लेख '21 वीं सदी में मुसलमान चिंतन और सरोकार' (भाग-2), संपादक- डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव, ओमेगा पब्लिकेशन, दिल्ली से साभार.)

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युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं अग्रणी ब्लागर  आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए जाना जाता है. कॉलेज में प्रवक्ता के साथ-साथ साहित्य की तरफ रुझान. आकांक्षा यादव जी की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई, तत्पश्चात-इण्डिया टुडे, नवनीत,साहित्य अमृत,आजकल, दैनिक जागरण,जनसत्ता,राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला,स्वतंत्र भारत,आज, राजस्थान पत्रिका,इण्डिया न्यूज,उत्तर प्रदेश, अक्षर पर्व,शुभ तारिका,गोलकोण्डा दर्पण,युगतेवर,हरिगंधा,हिमप्रस्थ, युद्धरत आम आदमी,अरावली उद्घोष,प्रगतिशील आकल्प,राष्ट्रधर्म,नारी अस्मिता,अहल्या, गृहलक्ष्मी,गृहशोभा,मेरी संगिनी,वुमेन ऑन टॉप,बाल भारती,बाल साहित्य समीक्षा,बाल वाटिका,बाल प्रहरी,देव पुत्र,अनुराग,वात्सल्य जगत, इत्यादि सहित शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में कविता, लेख और लघुकथाओं का अनवरत प्रकाशन.

नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

 आकांक्षा यादव को विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित भी किया गया है. जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि,न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान'' इत्यादि प्रमुख हैं।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता  आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. साझी संस्कृति को सहेजता सुन्दर आलेख...ब्लॉग भी सुन्दर.

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  2. वर्तमान पीढ़ी में भी तमाम नाम ऐसे हैं, जिन्होंने साझी संस्कृति हेतु न सिर्फ प्रयास किये बल्कि समाज को एक नई राह भी दिखाई। इस साझी सद्भावना को ही मशहूर शायर मोहसिन काकोरवी ने इन शब्दों में सँजोया है -

    गर तेरा इज्न हो तो ब्राह्यण करे वजू,
    गंगा नहाए शेख, बेकार जुस्तजू।....Bahut Khub.

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  3. आकांक्षा जी, वाकई आप सशक्त और बेजोड़ लिखती हैं. महिला दिवस पर सशक्त पोस्ट...बधाई.

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  4. बेहतरीन आलेख. साझा संस्कृति के सुन्दर उदाहरण.

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  5. आकांक्षा मैडम जी खूब लिखती हैं. आज ही आपका लेख जनसत्ता में पढ़ा..अच्छा लगा. मेरी तरफ से प्रणाम.

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